Wednesday, June 17, 2009

बेनाम मोहब्बत


मोहब्बत से भी नफरत हो गई है
हमें यह कैसी वहशत हो गई है
फ़ना कर डालू ख़ुद को और सब को
मेरी यह कैसी फितरत हो गई है
जहाँ मतलब वहां मोहब्बत मिलेगी
तिजारत से मोहब्बत हो गई है
मुझे वहशत थी जिस दीवानगी से
वो ही मेरी किस्मत हो गई है

6 comments:

ओम आर्य said...

प्यार ऐसा ही होता है जिसमे कुछ दिखता नही है .....

परमजीत बाली said...

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए है।बधाई।

Palak said...

mahobat se nafrat se kya hoga hasil
jo jism se ho kar ruh mai uthar chuki hai
kehtay hai ruh to hai allah ka ghar
bhala allah ke dar se kaise narazgi

nice one..
keep posting...

Nirmla Kapila said...

bahut bhaavmay abhivyakti hai aabhaar

M VERMA said...

खूबसूरत एहसास; अच्छी रचना

'अदा' said...

मोहब्बत से भी नफरत हो गई है
हमें यह कैसी वहशत हो गई है

ji haan kabhi kabhi aisa bhi hota hai...
bahit hi vazib si gazal hain...insaani zajbaaton ko bahut hi sahi aur saade tareeke se uker diya aapne..
ye itna asaan nahi hai..
bahut bahut badhai aapko...